मटका का इतिहास: कपास के भाव से ऑनलाइन तक
आज किसी भी बाज़ार का रिज़ल्ट फ़ोन पर पलक झपकते दिख जाता है। पर इस खेल की शुरुआत न इंटरनेट से हुई थी, न किसी घड़े से। इसकी जड़ें कपास के कारोबार में हैं। इस पेज पर सिर्फ़ वही बातें लिखी गई हैं जो भरोसे से कही जा सकती हैं। जिन तारीख़ों और किस्सों की पक्की पुष्टि नहीं मिलती, उन्हें जान-बूझकर छोड़ दिया गया है।
कपास के भाव पर दांव
1950 और 1960 के दशक में कपास के भाव न्यूयॉर्क से रोज़ बॉम्बे (आज की मुंबई) तक पहुँचते थे। बॉम्बे में कुछ लोग इन भावों पर दांव लगाने लगे। शर्त इस बात पर लगती थी कि कपास का भाव खुलते वक़्त क्या होगा और बंद होते वक़्त क्या। खुलने और बंद होने के यही दो भाव थे; खेल में आज जिन्हें ओपन व क्लोज कहा जाता है, उनकी जड़ यहीं है।
भाव बंद हुए, पर दांव की आदत नहीं
1960 के दशक की शुरुआत में न्यूयॉर्क से भाव आने का यह सिलसिला थम गया। जो लोग रोज़ इन भावों के सहारे दांव लगाते थे, उन्हें अब कोई दूसरा नंबर चाहिए था। तब कुछ लोगों ने अपने नंबर खुद निकालने शुरू किए।
तरीका सीधा था। कागज़ की पर्चियों पर अंक लिखे जाते, उन्हें मिट्टी के एक घड़े में डाला जाता और फिर उसमें से पर्ची निकालकर नंबर सबको बता दिया जाता। मिट्टी के घड़े को आम बोलचाल में मटका कहते हैं, और इसी घड़े ने पूरे खेल को उसका नाम दे दिया। घड़ा बहुत पहले पीछे छूट गया, लेकिन नाम आज तक वही है।
कल्याणजी भगत: 1962
नंबर ड्रॉ चलाने वालों में कल्याणजी भगत का नाम सबसे पहले लिया जाता है। उन्होंने 1962 में अपना मटका शुरू किया, जिसे कल्याण मटका और वर्ली मटका, दोनों नामों से जाना गया। आज "कल्याण" नाम का जो बाज़ार सबसे ज़्यादा चर्चा में रहता है, उसका नाम भी इसी दौर से जुड़ा है।
रतन खत्री: 1964
दो साल बाद, 1964 में, रतन खत्री ने भी अपने नंबर ड्रॉ चलाने शुरू किए। मटका के शुरुआती इतिहास की कोई भी बात इन दो नामों के बिना पूरी नहीं होती: कल्याणजी भगत और रतन खत्री।
1990 का दशक: मुंबई में सख़्ती
1990 के दशक में मुंबई पुलिस ने मटका के कारोबार पर कड़ी कार्रवाई की। इस दबाव के बाद यह धंधा मुंबई से निकलकर दूसरी जगहों पर फैलने लगा। बाद के सालों में जब मोबाइल फ़ोन और इंटरनेट आम हो गए, तो यह कारोबार भी ऑनलाइन पहुँच गया, और नतीजे व चार्ट वेबसाइटों पर दिखने लगे।
एक नज़र में पूरी कहानी
| समय | क्या हुआ |
|---|---|
| 1950 और 1960 का दशक | न्यूयॉर्क से बॉम्बे आने वाले कपास के भावों पर दांव लगते थे |
| 1960 के दशक की शुरुआत | भाव आने बंद हुए; घड़े से पर्ची निकालकर नंबर बताए जाने लगे |
| 1962 | कल्याणजी भगत का मटका, जिसे कल्याण या वर्ली मटका कहा गया |
| 1964 | रतन खत्री ने अपने नंबर ड्रॉ शुरू किए |
| 1990 का दशक | मुंबई पुलिस की सख़्ती; कारोबार दूसरी जगहों पर गया |
| उसके बाद | कारोबार ऑनलाइन पहुँचा; नतीजे व चार्ट इंटरनेट पर आने लगे |
पुराना ढाँचा, आज का रिज़ल्ट
इतने बदलावों के बाद भी रिज़ल्ट का ढाँचा पुराने ज़माने की याद दिलाता है। आज भी हर बाज़ार पहले ओपन पर तीन अंकों का पन्ना निकालता है और फिर क्लोज पर दूसरा पन्ना। बीच की जोड़ी इन दोनों पन्नों के अंकों से बनती है, जैसे 458-74-239 में 74। यह हिसाब सट्टा मटका की शुरुआती गाइड में आसान उदाहरणों के साथ समझाया गया है।
Satta Matka हर बाज़ार के पुराने नतीजे दो रूपों में सँभालकर रखता है। जोड़ी चार्ट में रोज़ की केवल जोड़ी रहती है, जबकि पैनल चार्ट में पूरा रिज़ल्ट, यानी दोनों पन्ने भी और जोड़ी भी। दोनों चार्ट बाज़ारों की सूची से खुलते हैं, और इन्हें पढ़ने का तरीका चार्ट पढ़ना सीखें पेज पर है। अंग्रेज़ी में यही कहानी matka history पेज पर भी पढ़ी जा सकती है।
इतिहास से जुड़ी कुछ गलतफ़हमियाँ
- "पुराने ज़माने के नंबर आज भी चलते हैं।" कपास के भावों या 1960 के दशक के ड्रॉ का आज के किसी रिज़ल्ट से कोई संबंध नहीं है। हर ड्रॉ अपने आप में नया होता है।
- "पुराना और बड़ा नाम हो तो नंबर पक्का होता है।" किसी मार्केट का नाम कितना भी पुराना हो, उसका अगला रिज़ल्ट आने से पहले उसे कोई नहीं जानता।
- "इतिहास जान लेने से जीतना आसान हो जाएगा।" इतिहास बस यह बताता है कि खेल कहाँ से आया। अगला नंबर क्या होगा, यह वह नहीं बता सकता।
आज की कानूनी स्थिति और सावधानी
मुंबई में हुई कार्रवाई खुद दिखाती है कि यह खेल हमेशा कानून के घेरे में रहा है। आज भी भारत के ज़्यादातर राज्यों में मटका पर दांव लगाना गैरकानूनी है, और जुए से जुड़े कानून हर राज्य में अलग हैं। यह पेज बस इतिहास बताने के लिए लिखा गया है। 18 साल से कम उम्र के लोगों को इस खेल से दूर ही रहना चाहिए। जो लोग पैसे लेकर "फिक्स नंबर" या "लीक जोड़ी" देने का दावा करते हैं, वे धोखेबाज़ हैं। Satta Matka पर न कोई दांव लगता है और न पैसा जमा होता है; यहाँ केवल आ चुके रिज़ल्ट और उनका रिकॉर्ड रखा जाता है।